6 अगस्त 2010, 13:14

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी- मेरे दिल का दर्द!

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी-  मेरे दिल का दर्द!

"आतंक और बर्बरता"! - विश्व प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ लियोनिद रॉशाल ने  हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी की 65

"आतंक और बर्बरता"! - विश्व प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ लियोनिद रॉशाल ने  हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी की 65वीं बरसी पर इन शब्दों में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं।

आज से ठीक 65 साल पहले अमरीका ने इन जापानी शहरों पर परमाणु बम  गिराए थे। यह मानवजाति के इतिहास में परमाणु हथियारों का सबसे पहला प्रयोग था।  और यह परमाणु बम सैन्य दस्तों और सैन्य अड्डों पर नहीं बल्कि शांतिपूर्ण कस्बों पर गिराए गए थे।  प्रसिद्ध बाल चिकित्सा सर्जन लियोनिद रॉशाल ने कहा- हरेक इंसान को अपने जीवन में कम से कम एक बार हिरोशिमा और नागासाकी की यात्रा करनी चाहिए ताकि इस त्रासदी की भयानकता को महसूस किया जा सके। उन्होंने कहा कि हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी मेरे दिल का दर्द बन गई है क्योंकि मैंने इन शहरों को अपनी आंखों से देखा है। 65 साल पहले वहाँ जो कुछ भी हुआ वह आतंक और बर्बरता थी। लियोनिद रॉशाल ने आगे कहा-

ऐसा कोई भी कारण नहीं था कि रक्षाहीन लोगों पर, जिनका सेना से कोई संबंध नहीं था, परमाणु बम बरसाए जाते। यह बम इन लोगों पर सिर्फ़ इसलिए गिराए गए क्योंकि वे जापानी लोग थे। ऐसे शहर नष्ट कर दिए गए जहां पर कोई सैन्य उत्पादन भी नहीं किया जाता था। बच्चों और वयस्कों की हज़ारों लाशें! शहरों की बर्बादी! इस बर्बरता को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। किसी युद्ध में भी ऐसी बर्बरता को सही नहीं ठहराया जा सकता है। मैं समझता हूँ कि युद्ध  बर्बरता का ही एक दूसरा नाम है। यह तर्क भी दिया जाता है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी की बदौलत हज़ारों सैनिकों की जानें बचाई जा सकी थीं। तर्क जो भी हो, यह क्रूरता ही थी,  बर्बरता ही थी!

लियोनिद रॉशाल को गहरा विश्वास है कि हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी - पूरी दुनिया के लिए एक भयानक सबक है। यह इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे एक देश ने दूसरे देश की नागरिक आबादी पर इतना बड़ा ज़ुल्म किया। जिन लोगों ने परमाणु बमबारी करने का हुक्म दिया था उनके व्यवहार की तुलना आतंकवादियों से की जा सकती है जो अधिक से अधिक निर्दोष लोगों की जानें लेने की कोशिशें करते हैं।

यह भी एक विडंबना है कि आज की नई जापानी पीढ़ी के लोग 65 साल पहले अमरीका द्वारा की गई परमाणु बमबारी की वजह से घटी त्रासदी को धीरे धीरे भूलते जा रहे हैं। जापानी टीवी और रेडियो चैनलों द्वारा कराए गए एक ताज़ा जनमत सर्वेक्षण के अनुसार लगभग इस देश की आधी आबादी इन दुखद घटनाओं की सही सही तिथि बताने में भी असमर्थ है। आजकल उन लोगों की राय तक नहीं पूछी जाती है जिन पर इस बमबारी का भयानक प्रभाव पड़ा था। इस सम्बन्ध में परमाणु बमबारी से पीड़ितों की अखिल जापानी सभा के अध्यक्ष हिंदेनोरी यामामोटो ने कहा-

आजकल इस बमबारी से प्रभावित  22 हज़ार लोग अभी जीवित हैं जिन्हें हिबाकूसिया  कहा जाता है। उनके जीवन को आसान जीवन नहीं कहा जा सकता है। वे कुछ भी कर नहीं पाते हैं। उन्हें केवल पेंशन मिल जाती है। इसलिए हमारी सभा के समक्ष दो कार्य हैं। पहला कार्य है-  सम्पूर्ण परमाणु निःस्त्रीकरण के लक्ष्य की प्राप्ति। इस दिशा में आशा की एक किरण दिखाई दी है। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक के शुरू में रूस और अमरीका ने परमाणु हथियारों में कटौती करने हेतु अन्य देशों के लिए एक उदाहरण पेश किया था। उसके बाद हिरोशिमा में हुए "परमाणु क्लब" के देशों के एक सम्मेलन में सभी देशों ने ऐलान किया था कि वे पूरी दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास करेंगे। हिंदेनोरी यामामोटो ने यह भी कहा हम हिबाकूसिया के बारे में कानून को बदलवाना चाहते हैं। क्योंकि सरकार ने न तो हमें कोई मुआवज़ा दिया है और न ही हम से कोई माफ़ी मांगी है।

इस तथ्य के बावजूद है कि समय बीतने के साथ साथ स्मृति क्षीण हो जाती है जापान में हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। यह दुनिया के अन्य देशों लोगों के लिए भी एक ऐतिहासिक स्मृति है। रूस के लोगों का मानना है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे भयानक घटना थी और इसे कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

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