8 अगस्त 2010, 16:12

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी - समस्त मानवजाति के लिए एक सबक

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी - समस्त मानवजाति के लिए एक सबक

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमरीकियों को शायद इस बात का एहसास नहीं था कि वे अगस्त 1945

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमरीकियों को शायद इस बात का एहसास नहीं था कि वे अगस्त 1945 में दो अल्पज्ञात जापानी शहरों - हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु बम गिराकर किस भानुमती के पिटारे को खोल रहे हैं।  

65 साल पहले 1945 की गर्मियों के अंतिम महीने में पॉट्सडैम शांति सम्मेलन के दौरान  अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस बात का ऐलान किया कि अमरीका के पास एक नया सुपर हथियार है। वे शायद सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन की  आँखों में कोई डर ख़ौफ़ देखना चाहते थे। लेकिन स्टालिन ने ऐसा प्रभाव दिया जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ है। और इसके कुछ ही दिनों के बाद हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया।

 इस परमाणु बमबारी का कोई सैन्य महत्व नहीं था। इन शहरों में हथियार बनाने वाले कारखाने मौजूद नहीं थे। न ही वहाँ कोई बड़ा सैन्य जमाव था। अमरीका दरअसल अपने सहयोगी देश के नेता स्टालिन को यह दिखाना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का फैसला कौन करेगा। और इसके लिए उसने लाखों जापानी नागरिकों के जीवन बलिदान कर दिए।

रूस के विश्व प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ लियोनिद रॉशाल ने हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी को अमरीकी आतंक और बर्बरता बताया।  लियोनिद रॉशाल ने कहा-

ऐसा कोई भी कारण नहीं था कि रक्षाहीन लोगों पर, जिनका सेना से कोई संबंध नहीं था, परमाणु बम गिराए जाते। यह बम इन लोगों पर सिर्फ़ इसलिए गिराए गए क्योंकि वे जापानी लोग थे। ऐसे शहर नष्ट कर दिए गए जहां पर किसी प्रकार के हथियारों के कारखाने नहीं थे। बच्चों और वयस्कों की हज़ारों लाशें! शहरों की बर्बादी! इस बर्बरता को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। किसी युद्ध में भी ऐसी बर्बरता को सही नहीं ठहराया जा सकता है। मैं समझता हूँ कि युद्ध  बर्बरता का ही एक दूसरा नाम है। यह तर्क भी दिया जाता है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी की बदौलत हज़ारों सैनिकों की जानें बचाई जा सकी थीं। तर्क जो भी हो, यह क्रूरता ही थी,  बर्बरता ही थी!

उस क्षण से ही मानवजाति हथियारों की दौड़ में कूद पड़ी। कई साल बीत जाने के बाद सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका के नेताओं को दुनिया के भाग्य के लिए अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ। कई दशकों में परमाणु हथियारों के विशाल भंडार जमा कर लिए गए। इन हथियारों से यह दोनों देश केवल एक दूसरे को ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता को कई बार नष्ट कर सकते थे।

सौभाग्य से मानवजाति को फिर से कभी परमाणु हमले का मुँह देखना नहीं पड़ा है हालांकि वह सामूहिक विनाश के इन हथियारों के इस्तेमाल की दहलीज़ पर खड़ी थी। समस्त मानवजाति के लिए उत्पन्न इस भयंकर ख़तरे को भांपते हुए सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका के नेताओं ने विगत् शताब्दी के सातवें दशक में परमाणु हथियारों को कम करने के तरीके खोजने की प्रक्रिया शुरू कर दी जो अभी भी जारी है। अब जब दुनिया में राजनीतिक प्रणालियों में प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो गई है इन हथियारों की दौड़ सही अर्थों में बेमायने होकर रह गई है।

दुनिया की दो प्रमुख परमाणु शक्तियों - रूस और अमरीका ने अपने सम्बन्धों को  "पुनर्स्थापित" करके एक परमाणु मुक्त दुनिया की ओर आगे बढ़ने की अपनी तत्परता की घोषणा की है। यह एक लम्बा और जटिल रास्ता है। ख़ासकर तब जब कुछ ऐसे देशों के पास परमाणु हथियार हों जिनके राजनीतिक नेताओं के व्यवहार के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। यह भी एक बहुत बड़ा ख़तरा है। इन देशों में उत्तरी कोरिया और ईरान को शामिल किया जा सकता है। और जैसा कि कहा जाता है राहगीर ही रास्ते पर आगे बढ़ सकता है। यह बात रूस और अमरीका पर लागू होती है जिन्होंने इस वर्ष रणनीतिक आक्रामक परमाणु हथियारों में कटौती के लिए एक नई संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। यह इस बात का सबूत है कि रूस और अमरीका परमाणु निःस्त्रीकरण की प्रक्रिया को जारी रखने और इस बात के लिए अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से समझते हैं कि हिरोशिमा और नागासाकी जैसी त्रासदी को कभी नहीं दोहराया जाएगा।

अब दोनों देशों के सांसदों पर बहुत कुछ निर्भर करता है। उन्हें जितनी जल्दी हो सके रणनीतिक आक्रामक परमाणु हथियारों में कटौती के लिए इस नई संधि का अनुमोदन कर देना चाहिए। ऐसा करने से परमाणु निःस्त्रीकरण की अन्य समस्याओं का समाधान करना भी संभव हो जाएगा।

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