15 जुलाई 2012, 17:24

हिमाचल प्रदेश की सुरम्य कुल्लू घाटी के नग्गर में अंतर्राष्ट्रीय रेरिख स्मारक ट्रस्ट की 20वीं वर्षगाँठ धूमधाम से

हिमाचल प्रदेश की सुरम्य कुल्लू घाटी के नग्गर में अंतर्राष्ट्रीय रेरिख स्मारक ट्रस्ट की 20वीं वर्षगाँठ धूमधाम से मनाई गई। विख्यात रूसी चित्रकारों और पूर्व के अध्येताओं- रेरिख परिवार की हवेली में, जो अब स्मारक कहलाती है, प्रातः काल की शांति-पूजा हुई, फिर अतिथियों ने भाषण दिए, और एक सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किया गया। इस ट्रस्ट के आजीवन संरक्षक और भारत में रूस के राजदूत अलेक्सांदर कदाकिन ने कहा कि पिछले वर्षों में यह नग्गर हवेली विश्व स्तर का एक अद्वितीय स्मारक बन गई है। हर साल यहाँ एक लाख तक लोग आते हैं, जो रेरिख परिवार की कला-धरोहर का आस्वादन करते हैं और उनके आध्यात्मिक मूल्यों की जानकारी पाते हैं। अलेक्सांदर कदाकिन ने कहा-

यह बात हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण और मूल्यवान है कि सन् 1942 में नेहरूजी अपनी बेटी इंदिरा के साथ रेरिख दम्पति से मिलने नग्गर आए थे। यह भारत की आज़ादी से पाँच साल पहले की बात है। उन दिनों भारत में स्वतंत्रता संग्राम अपने पूरे ज़ोर पर था और दुनिया का एक बड़ा भाग द्वितीय विश्वयुद्ध की आग में झुलस रहा था, यह सब होते हुए भी उन्होंने तब सोवियत संघ के साथ मैत्री का समाज बनाने के सवाल पर बातें की थीं।

हमारे लिए यह बड़ी खुशी की बात है कि रेरिख ट्रस्ट की गतिविधियों की एक मुख्य दिशा का संबंध बच्चों के साथ है। युवा पीढ़ी ही भविष्य में रेरिख का झंडा लेकर आगे बढ़ेगी, जिसका उद्देश्य है- संस्कृति की राह पर चलते हुए शांति की मंज़िल की ओर। इसका उद्देश्य कुल्लू घाटी और हिमाचल प्रदेश की समृद्ध प्रकृति और यहाँ की विलक्षण परंपराओं से बच्चों को परिचित कराना है। रेरिख ट्रस्ट यहाँ की संस्कृति और सौंदर्य के मूल्यों की थाह पाने का अवसरप्रदान करता है। यहाँ पिछले 9साल से येलेना रेरिख कला महाविद्यालय खुला हुआ है जो बहुत सफलतापूर्वक चल रहा है। इस कला महाविद्यालय में 100से अधिक बच्चे चित्रकला, लकड़ी पर नक्काशी, बुनाई, भारतीय शास्त्रीय नृत्यों, संगीतऔर मुखर कला की शिक्षा पाते हैं। रूस और विश्व के अन्य देशों से चित्रकार, मूर्तिकार, संगीतकार, नर्तक और शिक्षक यहाँ आते हैं और बच्चों से अपना ज्ञान बांटते हैं। कॉलेज के सभी छात्र इसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया ईमानदारी, खुशी और रचनात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं। इससे सौंदर्य की रचनात्मक शक्ति के बारे में रेरिख के विचार की पुष्टि होती है। सौंदर्य की यह शक्ति भाषा, राष्ट्रीयता या धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोगों को एकजुट करती है।

राजदूत अलेक्सांदर कदाकिन ने कहा कि इस जयंती से कुछ समय पहले ट्रस्ट में वातावरण गडबडा गया था, कुछ हद तक स्थानीय अधिकारियों के कदमों के कारण, जो ट्रस्ट में रूसियों की सहभागिता को न्यूनतम स्तर पर रखना चाहते थे। राजदूत ने आशा प्रकट की कि ट्रस्ट में सृजनात्मक वातावरण बनेगा और भारत की केन्द्र सरकार इसके काम में सक्रिय रूप से भाग लेगी।

महोत्सव में मौजूद लोगों की यह एकमत राय थी कि रूसी शहर उल्यानोव्स्क से आई "एक्सिटोन" नामक बैले कलाकार मंडली का प्रदर्शन विलक्षण था। 20वीं वर्षगाँठ के समारोह में कुल्लू घाटी के म्युनिसिपल प्रशासन के प्रधान कमल सरोठ और शिमला स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के प्रधान संरक्षक हरी चौहान ने भाग लिया।

  •  
    और शेयर
आप रोज़ कितने घंटे इन्टरनेट में बिताते हैं?
 
ई-मेल